सुभाष चंद्र बोस पर कविता 2020- Poem On Subhash Chandra Bose in Hindi & Marathi- नेताजी की कविताएँ

सुभाष चंद्र बोस पर कविता 2020- सुभाष चन्द्र बोस एक महान स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त थे। इनका जन्म एक अमीर हिन्दू कायस्थ परिवार में 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। ये जानकीनाथ बोस (पिता) और प्रभावती देवी (माता) के पुत्र थे। अपनी माता-पिता के 14 संतानों में से ये 9वीं संतान थे। इन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा कटक से ली जबकि मैट्रिकुलेशन डिग्री कलकत्ता से और बी.ए. की डिग्री कलकत्ता यूनिवर्सिटी (1918 में) से प्राप्त की। आज के इस लेख में हम सभी पाठको के लिए इस महान देशभक्त की कुछ कविताएं पेश कर रहे है, और साथ ही आपको इनकी जयंती पर याद करते हुए भारत माता के इस सच्चे सपूत को शत-शत नमन करते हैं | जय हिन्द जय भारत !!



Poem On Subhash Chandra Bose in Hindi


है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनिया के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।
यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जय-हिन्द निशानी है।।
प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।
यह वीर चक्रवर्ती होगा, या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने, पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।
बाँधे जाते इंसान, कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
काया ज़रूर बाँधी जाती, बाँधे न इरादे जाते हैं।।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था, जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था अँग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।
जिस तरह धूर्त दुर्योधन से, बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के, पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह यह तोड़ पिंजरा, तोते-सा बेदाग़ गया।
जनवरी माह सन् इकतालिस, मच गया शोर वह भाग गया।।
वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे, ये धूमिल अभी कहानी है।
हमने तो उसकी नई कथा, आज़ाद फ़ौज से जानी है।।
– गोपालप्रसाद व्यास


सुभाष चंद्र बोस की कविता


वो था सुभाष, वो था सुभाष
वो भी तो खुश रह सकता था
महलों और चौबारों में
उसको लेकिन क्या लेना था
तख्तो-ताज-मीनारों से?
वो था सुभाष, वो था सुभाष
अपनी मां बंधन में थी जब
कैसे वो सुख से रह पाता
रणदेवी के चरणों में फिर
क्यों ना जाकर शीश चढ़ाता?
अपना सुभाष, अपना सुभाष
डाल बदन पर मोटी खाकी
क्यों न दुश्मन से भिड़ जाता
‘जय-हिन्द’ का नारा देकर
क्यों न अजर-अमर हो जाता?
नेता सुभाष, नेता सुभाष
जीवन अपना दांव लगाकर
दुश्मन सारे खूब छकाकर
कहां गया वो, कहां गया वो
जीवन-संगी सब बिसराकर?
तेरा सुभाष, मेरा सुभाष
मैं तुमको आजादी दूंगा
लेकिन उसका मोल भी लूंगा
खूं बदले आजादी दूंगा
बोलो सब तैयार हो क्या?
गरजा सुभाष, बरसा सुभाष
वो था सुभाष, अपना सुभाष
नेता सुभाष, बाबू सुभाष
तेरा सुभाष, मेरा सुभाष
अपना सुभाष, अपना सुभाष।


नेताजी की कविताएँ



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परमवीर निर्भीक निडर,
पूजा जिनकी होती घर घर,
भारत मां के सच्चे सपूत,
हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर।
सन अट्ठारह सौ सत्तानवे,
नेता जी महान थे जन्मे,
कटक ओडिशा की धरती पर,
तेईस जनवरी की शुभ बेला में।
देशभक्तों के देशभक्त,
दूरंदेश थे अति शशक्त,
नारा जय हिन्द का देकर बोले,
आजादी दूंगा तुम देना रक्त।
आजादी की लड़ी लड़ाई,
आजाद हिन्द फ़ौज बनाई,
जन जन को आगे ले आए,
तरुणाई को दिशा दिखाई।
अन्याय कभी न सहना है,
सुलह न उससे करना है,
अपराध है ऐसा कुछ करना,
नेता जी का यह कहना है।
~ हरजीत निषाद


Short Poem On Subhash Chandra Bose in Hindi


दूर देश में किसी विदेशी गगन खंड के नीचे
सोये होगे तुम किरनों के तीरों की शैय्या पर
मानवता के तरुण रक्त से लिखा संदेशा पाकर
मृत्यु देवताओं ने होंगे प्राण तुम्हारे खींचे
प्राण तुम्हारे धूमकेतु से चीर गगन पट झीना
जिस दिन पहुंचे होंगे देवलोक की सीमाओं पर
अमर हो गई होगी आसन से मौत मूर्च्छिता होकर
और फट गया होगा ईश्वर के मरघट का सीना
और देवताओं ने ले कर ध्रुव तारों की टेक –
छिड़के होंगे तुम पर तरुनाई के खूनी फूल
खुद ईश्वर ने चीर अंगूठा अपनी सत्ता भूल
उठ कर स्वयं किया होगा विद्रोही का अभिषेक
किंतु स्वर्ग से असंतुष्ट तुम, यह स्वागत का शोर
धीमे-धीमे जबकि पड़ गया होगा बिलकुल शांत
और रह गया होगा जब वह स्वर्ग देश
खोल कफ़न ताका होगा तुमने भारत का भोर।
– धर्मवीर भारती


सुभाष चंद्र बोस मराठी कविता


नेताजी सुभाषचंद्र बोस
नदीचा प्रवाह ज्या वेळी वाहत असतो तो काळ आहे का?
आता वेळ आली आहे की मोठे वादळ मजबूत पर्वत मोडत आहे.
बहुतेक वेळा जगाचे लोक वेळेत रडतात.
परंतु काही असे आहेत, इतिहास बनवा.
ही एक अत्यंत विलक्षण इतिहास-मनुष्य आहे.
जे रक्त कणांसह लिहिलेले आहे, ज्यांचे जिहाण चिन्ह आहे.
लव्ह सुभाष, नेता सुभाष, भारतभूमीचा प्रकाश होता.
जेव्हा त्याचा जन्म झाला तेव्हा संगीतकारांनी भविष्याबद्दल लिहिले.
ती वीर चक्रवर्ती असेल, किंवा त्यागी तपस्वी असतील.
ज्याची वयाची वयाचे गौरव, भारतीय लोक राहतात.
म्हणूनच त्याच वीर नोकरशाहीला तुरुंगात पकडण्यात आले.
परंतु क्रोधित केहर्यांना कधीही अडकले नव्हते.
लोक अडकले, उडी मारली नाही.
काया बांधले पाहिजे आणि बांधील नाहीत.
तो एक पराक्रमी लढाऊ खेळाडू होता, जो संधीचा त्याग करीत होता.
पारा इंग्रजांच्या हातात गेला.
दुर्योधन शिल्लक राहण्याच्या मार्गावर यदुुनंदन आले होते.
जसे शिवाजी मुगलोंचा वापर करीत होते तसतसे रक्षक भुकेले होते.
त्याचप्रमाणे तो तुटलेला होता आणि तोफ मूर्ख बनला.
जानेवारी मध्ये तो पळून गेला.
ते कुठे गेले, ते कुठे राहिले, ही आता एक अस्पष्ट कथा आहे.
आझाद फौजने आपल्या अलीकडील कथेतून आपल्याला कळवावे लागेल.
गोपाल प्रसाद व्यास


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