जगन्नाथ रथ यात्रा पर कविता 2019- Rath Yatra Poem in Hindi, Odia Font

जगन्नाथ रथ यात्रा पर कविता- भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो अपनी बेहतरीन नक्काशी व भव्यता लिए प्रसिद्ध है। इसी को देखते हुए आज हम आपको बताएँगे, Jagnnath Rath Yatra Poem in Hindi, Rath Yatra Kavita in Bengali, Jagannath Puri Rath Yatra Poem, रथ यात्रा हिंदी कविता 2019, जगन्नाथ रथ यात्रा पर कविता, जिनको आप सोशल मीडिया पर भी शेयर कर सकते है |



Rath Yatra Poem in Hindi


शुक्ल पक्ष आषाढ़ द्वितीय।
रथयात्रा त्योहार अद्वितीय।

चलो चलें रथयात्रा में।
पुरी में लोग बड़ी मात्रा में।

जगन्नाथ के मंदिर से।
भाई बहन वो सुन्दर से।

जगन्नाथ, बलभद्र हैं वो।
बहन सुभद्रा संग में जो।

मुख्य मंदिर के बाहर।
रथ खड़े हैं तीनों आकर।

कृष्ण के रथ में सोलह चक्के।
चौदह हैं बलभद्र के रथ में।
बहन के रथ में बारह चक्के॥

रथ को खींचों।
बैठो न थक के।

मौसी के घर जाएंगे।
मंदिर (गुंडिचा )हो आएंगे।

नौ दिन वहां बिताएंगे।
लौट के फिर आ जाएंगे।

बहुड़ा जात्रा नाम है इसका।
नाम सुनो अब कृष्ण के रथ का।

नंदिघोषा, कपिलध्वजा।
गरुड़ध्वजा भी कहते हैं।

लाल रंग और पीला रंग।
शोभा खूब बढ़ाते हैं।

तालध्वजा रथ सुन्दर सुन्दर।
भाई बलभद्र बैठे ऊपर।

नंगलध्वजा भी कहते हैं।
बच्चे, बूढ़े और सभी।

गीत उन्हीं के गाते हैं।
रंग-लाल, नीला और हरा।

ये त्योहार है खुशियों भरा।
देवदलन रथ आता है।

बहन सुभद्रा बैठी है।
कपड़ों के रंग काले-लाल।

दो सौ आठ किलो सोना।
तीनों पर ही सजता है।

खूब मनोहर सुन्दर झांकी।
कीमत इसकी कोई न आंकी।

दृश्य मन को भाता है।
एक झलक तो पा लूँ अब।

विचार यही बस आता है।

चलो चलें रथ यात्रा में।
पुरी में लोग बड़ी मात्रा में॥


रथ यात्रा कविता इन बंगाली


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তার হাতে
কোন অস্ত্র ছিল
তার মুখ টকটকে ছিল
তিনি একটি খোলা জিপ এসেছিলেন

তাকে পিছনে
দীর্ঘ প্রশস্ত গাড়ী যানবাহন ছিল
কপাল উপর ব্যান্ডেজ
Twirls স্লোগান জোশ
অনুসরণকারীদের
ক্রেজি ভিড়
এটি প্রায়

তিনি ট্রাম্পেট যাচ্ছে
Tots তৈরি
আশা রাস্তা

এমনকি তার আগমনের আগে
মানুষ ঘরে ঝুলছিল
কোন ক্ষতি ভয়
বাজার বন্ধ
স্পন্দন চুপ করে ছিল
কেউ দেখছিল না
তার যাত্রা
অনুগামীদের frenetic ভিড়


Poem on Rath Yatra in English


Shukla Party Ashadh II
Rath Yatra festival unique

Let’s go in the Rath Yatra.
People in Puri in large quantities

From the temple of Jagannath
Brother Sister from that beautiful

Jagannath, Balabhadra Hai He
Sister in Subhadra Sang

Outside the main temple
The chariots are standing all three.

Sixteen wheels in Krishna’s chariot
Fourteen are in the chariot of Balabhadra.
Twelve wheels in sister’s chariot

Drag the chariot
Sit not tired of

Aunt will go home.
The temple (Gundicha) will come.

Spend nine days there.
The return will come again.

Bahadra Jatra is its name.
Listen to the name of Krishna’s chariot now.

Nandighosa, Kapilagwaja
Garuda swavja is also called.

Red color and yellow color
Beautify a lot.

Tandhwaja Ratha Sundar Sundar
Brother Balabhadra sitting up

Nangalwajja is also called.
Children, old and all

The songs sing them.
Colored-red, blue and green

This festival is full of happiness.
Devadhan Chariot comes.

Sister Subhadra is sitting.
Clothing color black-red

Two hundred and eight kilos of gold.
All three are decorated.

Pretty picturesque tableaux
No one evaluated the price.

The scene pleases the mind.
Now get a glimpse.

The idea is just that.

Let’s go in the chariot journey.
People in Puri in large quantities !


Poem On Jagnnath Rath Yatra


 


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রথযাত্রা

রথযাত্রার দিন কাছে।

তাই রানী রাজাকে বললে, ‘চলো, রথ দেখতে যাই।’

রাজা বললে, ‘আচ্ছা।’

ঘোড়াশাল থেকে ঘোড়া বেরোল, হাতিশাল থেকে হাতি। ময়ূরপংখি যায় সারে সারে, আর বল্লম হাতে সারে সারে সিপাইসান্ত্রি। দাসদাসী দলে দলে পিছে পিছে চলল।

কেবল বাকি রইল একজন। রাজবাড়ির ঝাঁটার কাঠি কুড়িয়ে আনা তার কাজ।

সর্দার এসে দয়া করে তাকে বললে, ‘ওরে, তুই যাবি তো আয়।’

সে হাত জোড় করে বললে, ‘আমার যাওয়া ঘটবে না।’

রাজার কানে কথা উঠল, সবাই সঙ্গে যায়, কেবল সেই দুঃখীটা যায় না।

রাজা দয়া করে মন্ত্রীকে বললে, ‘ওকেও ডেকে নিয়ো।’

রাস্তার ধারে তার বাড়ি। হাতি যখন সেইখানে পৌঁছল মন্ত্রী তাকে ডেকে বললে, ‘ওরে দুঃখী, ঠাকুর দেখবি চল্‌।’

সে হাত জোড় করে বলল, ‘কত চলব। ঠাকুরের দুয়ার পর্যন্ত পৌঁছই এমন সাধ্য কি আমার আছে।’

মন্ত্রী বললে, ‘ভয় কী রে তোর, রাজার সঙ্গে চলবি।’

সে বললে, ‘সর্বনাশ! রাজার পথ কি আমার পথ।’

মন্ত্রী বললে, ‘তবে তোর উপায়? তোর ভাগ্যে কি রথযাত্রা দেখা ঘটবে না।’

সে বললে, ‘ঘটবে বই কি। ঠাকুর তো রথে করেই আমার দুয়ারে আসেন।’

মন্ত্রী হেসে উঠল। বললে, ‘তোর দুয়ারে রথের চিহ্ন কই।’

দুঃখী বললে, ‘তাঁর রথের চিহ্ন পড়ে না।’

মন্ত্রী বললে, ‘কেন বল্‌ তো।’

দুঃখী বললে, ‘তিনি যে আসেন পুষ্পকরথে।’

মন্ত্রী বললে, ‘কই রে সেই রথ।’

দুঃখী দেখিয়ে দিলে, তার দুয়ারের দুই পাশে দুটি সূর্যমুখী ফুটে আছে।

লিপিকা,
১৯১৭-১৯১৯ !


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